वो भी फिल्में ही तो थीं ,जो समरसता ,सामाजिक सद्भाव ,समानता ,शांति ,भाईचारा का संदेश दिया करती थी

70 के दशक तक भारत में जो फिल्में बना करती थी उनमें से बहुत सी फिल्में गरीबों ,मजदूरों ,निम्न वर्गीय से मध्यम वर्गीय परिवारों की सामाजिक और पारिवारिक समस्यायों की पृष्ठ भूमि पर आधारित हुआ करती थीं
ये फिल्में सार्थक ,सकारात्मक संदेश भी दिया करती थीं । इन फिल्मों में ऐसे मार्मिक और हृदयस्पर्शी दृश्य भी आते थे कि उससे स्वयं से जुड़ा पाकर दर्शकों के आंसू छलछलाने के साथ आंखों से उतर कर बहने लगते थे जिससे कई दर्शक सिनेमाहाल के भीतर या बाहर निकल कर आँसू पोछते हुए दिखाई देते थे चाहे वो फ़िल्म मदर इंडिया हो ,बालक हो ,दोस्ती हो ,गङ्गा जमुना हो ,घर घर की कहानी हो ,ऐसी बहुत सी फिल्में भी होती थी जो पूंजीवाद ,सामंतवाद के ख़िलाप गरीबों के संघर्ष पर ,छुआछूत की बुराई को लेकर बनी थी ,मुझे एक फ़िल्म की कहानी याद आ रही है जिसमें दिलीप कुमार एक सेठ द्वारा गांव में बस चलाने वाले सेठ का विरोध करते हैं क्योंकि इससे टाँगेवालों का रोजगार चला जाता ,इस फ़िल्म में कई सुमधुर गीत भी थे फ़िल्म का नाम अभी भूल रहा था लेकिन याद आ गया यह फ़िल्म नया-दौर थी
इस तरह की फिल्मों में कोई न कोई अत्याचारी ,निर्दयी शोषक ,सेठ ,लाला ,महाजन जरूर हुआ करता था ।इस तरह की फिल्में तत्कालीन सामाजिक समस्यायों का आईना हुआ करती थी और सच्चाई को प्रगट करती थी । फ़िल्म अपना देश में अमीर के ऊपर गरीब की हुई जीत का गीत ,सुन चंपा सुन तारा कोई जीता कोई हारा वाला गीत तो अब हर चुनावी जीत पर बजता है ।
वर्तमान दौर की फिल्मों और टी वी सीरियलों में तो निर्धन और निम्न मध्यम वर्ग गायब हो गया है ,जो दृश्य या कहानी आती है उसमें चकाचौन्ध और सम्पन्नता के दृश्य भरे रहते हैं जैसे मानों देश में सबकुछ जगमग है।
फिल्मों ,और टी वी सीरियलों में से न्यूज चैनलों में से गरीब ,मजदूर ,काश्तकार ,बेरोजगार ,की बात गायब हो जाने का यह दुष्प्रभाव पड़ा है कि यह वर्ग चर्चाओं से गायब हो गया है ।इनके सम्बन्ध में जब भी बात की जाती है तो उसके ऊपर कोई ध्यान नहीं देता है परंतु यदि रसूखदार ,सरमायादार के लिए सकारात्मक बात करो उनका गुणगान करो तो उनका जयकारा लगाने के लिए उनसे उपकृत लोगों की भीड़ न जाने किस बिल से निकलकर एकत्रित हो जाती है ।ऐसे में आम् आदमी की आवाज दब जाती है और उसे यह समझ नहीं आता कि उसे वो चौखट कहाँ मिलेगी जहां पर जाकर वो अपनी गुहार लगा सके ,उसे वो जहाँगिरी घण्टा कहाँ मिलेगा जिसे वो आधीरात को भी बजा सके ।?



