कभी नीम की छाँव तले गुजरता था, रायगढ़ से कोड़ातराई तक का सफर

कभी रायगढ़ में सड़कों के किनारे पीपल ,बरगद ,शिरीष ,नीम के पेड़ हुआ करते थे भीषण गर्मी में रायगढ़ को राहत पहुंचाया करते थे ।जूटमिल से आगे एफसीआई गोदाम के पास से सड़क के दोनों ओर नीम के पेड़ों की लंबी श्रृंखला हुआ करती थी ।जिसकी छांव में लोग कोड़ा तराई तक चले जाया करते थे ।
वृक्ष सड़क के परिधान हुआ करते हैं । अब वस्त्रहीन सड़कें स्वयं के पसीने से लथपथ हो जाया करती हैं । सड़क की चौड़ाई बढ़े यह तो ठीक है पर बोगनबेलिया और शो पेड़ के नाम पर वृक्षारोपण का दंभ तो न पालें ।
बारिश नहीं होने से सभी लोग गर्मी और तपन से लोग परेशान हो चुके हैं तो मौसम विभाग कभी हीट वेव चलने की तो कभी मानसून के सक्रिय होने की जानकारी दे रहा है ।
बारिश को लेकर घाघ और भड्डरी के रचित दोहों को भी पढ़ लें तो क्या हर्ज होता ?
कालिदास के यक्ष से पूछ लेते ।मृगशिरा में कभी पानी बरसा है? कि इसी साल बरसेगा ।बाँस तक नहीं काटे जाते मृगशिरा में ।
गाँव का साधारण किसान भी जानता है कि पंद्रह दिन मृगशिरा नक्षत्र प्रचंड ताप देता है ।यह ताप ही वर्षा का कारक होता है । मृगशिरा के ताप से जली धरती को आर्द्रा के गरजते बादल शांत करते हैं ।आर्द्रा आते ही न बरसे तो अकाल पड़ता है ।22 जून को मृगशिरा समाप्त होगा और आर्द्रा का आरंभ होगा । आषाढ़ का प्रथम दिवस 22 को होगा । कालिदास के आषाढस्य प्रथम दिवसे मेघ का यात्रा दिवस है । न आषाढ़ आया न आर्द्रा ।लोग तो ताप सह लेते लेकिन ये मौसम वैज्ञानिक घाघ की तो सुन लेते।
चैत्र से ज्येष्ठ वर्षा का गर्भ काल भले हों पर मृगशिरा वर्षा की प्रसवपीडा का काल है ताप तो होगा ही ।



