रायगढ़

मशहूर पतंगबाज मोहम्मद खलील को राजा चक्रधर सिंह ने कोलकाता से लाया था रायगढ़

रायगढ़ 12 जनवरी । रायगढ़ में पतंग बाजी की परंपरा स्टेट टाइम से चली आ रही है ,राजा चक्रधर सिंह स्वयं पतंगबाजी को देखने के शौकीन थे और आसमान में पतंग लड़ते देखकर उसका लुत्फ उठाया करते थे ।स्व राजा चक्रधर सिंह ने अपने इस शौक को पूरा करने के लिए कोलकाता से हुनरमंद पतंगबाज मोहम्मद खलील को रायगढ़ में बुलाया था और उसे अपने राज्य में प्रश्रय दिया था । पतंग उड़ाने से लेकर पेंच लड़ाने ,ढील देकर अचानक खींचकर विरोधी की पतंग काट देने और उसकी बाद कटी हुई पतंग और मांझा लूटने का आनन्द ही अलग हुए करता था और रायगढ़ में इसका भरपूर आनन्द लिया जाता था ।
यूपी ,गुजरात ,दिल्ली ,राजस्थान , सहित देश में कई अन्य क्षेत्रों में मकर संक्रांति के दिन पतंग उड़ाने की सदियों पुरानी परंपरा है ।पूरा आसमान पतंग से छा जाया करता है ।इस दौरान पतंग लड़ाते हुए ,पेंच बाजी के दृश्य आम हुआ करते हैं ।जिसकी पतंग कट जाती है वो निराश हो जाता है जो पतंग काटता है वो विजेता की मुद्रा में मुस्कुराता है ।कटी हुई पतंग और उसके साथ गए मांझा को लूटने के लिए होड़ भी शुरू हो जाती है ।
पतंग उड़ाने का इतिहास दो हजार साल से भी अधिक पुराना है ।पतंग का अविष्कार चीन में हुआ था और चीन से भारत आने वाले लोगों के जरिये पतंग और पतंगबाजी भारत पहुंची थी ।मुगल काल में पतंगबाजी को शाही खेल का दर्जा भी मिला था ।
पतंगबाजी को लेकर रायगढ़ की बात करें तो रायगढ़ में राजशाही काल में आयोजित होने वाले गणेश मेला में पतंगबाजी की प्रतियोगिता भी हुआ करते दूर दूर से आये पतंगबाज भी इस प्रतियोगिता में अपना हुनर दिखाया करते थे ।रायगढ़ के बीड़पारा के मोहम्मद खलील जिन्हें की बुद्धू के नाम से भी जाना जाता था रायगढ़ स्टेट के पतंगबाज हुआ करते थे । उनके बेटे कादर ने बताया कि उनके पिता को रायगढ़ के राजा चक्रधर स्वयं कोलकाता से लेकर रायगढ़ आये थे ।कादर ने बताया कि उनके पिता पतंग और मांझा खुद बनाया करते थे और बेचा भी करते थे। आज भी बीड़ पारा में उनकी की पतंग दुकान है जिसे अब उनके बेटे कादर संचालित किया करते हैं । रायगढ़ की पतंगबाजी की बात करें तो
रायगढ़ के प्रसिद्ध समाजसेवी सेठ पूनमचंद लुहारी वाला पतंगबाजी के बहुत बड़े शौकीन थे और पतंगबाजी में माहिर थे । वे पतंग उड़ाने के बाद चकरी में लगे मांझा को पूरा का पूरा ढील कर छोड़ दिया करते थे ।मशहूर पतंगबाज मोहम्मद खलील भी सेठ पूनम चंद लुहारीवाला के करीबी मित्रों में शामिल थे।
पिछले कुछ वर्षों से मकर संक्रांति के दिन रायगढ़ के आसमान में भी पतंग उड़ती हुई देखी जा सकती है ।पुराने दौर की बात करें तो स्कूलों में गर्मी की छुट्टी हुआ करती थी तो पतंगबाजी का खेल शुरू हो जाया करता था ।कोई अपनी छत से पतंग उड़ाता था तो कोई मैदान से पतंग उड़ाया करता था ।
इस दौर में रायगढ़ के इतवारी बाजार ,मंदिर चौक ,चांदनी चौक ,गांधी गंज , दारोगा पारा ,नटवर स्कूल का मैदान ,म्युनिसिपल स्कूल का मैदान पतंग उड़ाने के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे।
पतंग उड़ाना भी एक आर्ट हुआ करता था यह सबके बस की बात नहीं हुआ करती थी । पतंग उड़ाने के लिए दो लोगों की जरूरत पड़ा करती थी एक मांझे और सद्दल से लिपट चकरी सम्हालता था तो दूसरा पतंग उड़ाता था ।पतंग की पेंच लड़ाने का दृश्य भी अनोखा हुआ करता था ।पतंग की पेंच को लड़ते हुए देखने और उसका आनन्द लेने के लिए लोगों की निगाहें आसमान की ओर टिक जाया करती थी।

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