रायगढ़

झूलोत्सव के शहर रायगढ़ में सावन के महीने में पेड़ों की डालों पर झूले नहीं डला करते, परम्पराएं सिमट कर यादें बनकर रह गई ; सावन पर विशेष आलेख

रायगढ़। सावन का महीना चल रहा है तो रायगढ़ में झूला , ,झूला डाले जाने ,झूला झूलने की परम्परा ,संस्कृति ,इस अवसर पर गाये जाने वाले गीतों की बात तो जरूर की जाएगी ।भले ही यह सब आज हमारी यादों में सिमट गया हो ,इतिहास बनता क्यों ना जा रहा हो ।भारत में झूला झूलने की परम्परा और संस्कृति वैदिक काल से चली आ रही है ।भगवान श्री कृष्ण वृंदावन में राधा के संग झूला झूला करते थे और गोपिकाओं के साथ रास रचाया करते थे।कहा जाता है कि तभी से झूला झूलने की परम्परा चली आ रही है । सन 1812 के ‘द सर्वे ऑफ़ द डिस्ट्रिक्ट शाहाबाद’ (आज का आरा जिला) में फ्रांसिस बुकानन ने सावन में झूले व कजरी का वर्णन किया है। उनके अनुसार यह संसार की अनोखी परम्परा है। भारतीय महिलाओं के साथ अंग्रेजों की गोरी मेमों के झूलने तथा उमंग भरे अल्हड़पन को संपूर्णता से परिपूर्ण व अनुपम संस्कृति बताया है।इसकी लोकप्रियता ऐसी थी कि 1808 में शाहाबाद के जोन कमांडर रहे लॉर्ड मैकाले की पत्‍‌नी लूसी लूप तक को सावन का बेसब्री से इंतजार रहता था। वे भारतीय कर्मचारियों की पत्‍ि‌नयों एवं बेटियों के साथ झूला एवं कजरी का आनंद उठाया करती थीं। हिन्दू संस्कृति में सावन के महीने का एक अलग ही स्थान और महत्त्व है ,इस माह में कई त्यौहार ,मनाए जाते हैं तो मनोकामना की पूर्ति के लिए व्रत ,उपवास रखे जाते हैं ।सावन को लेकर जहाँ लोकगीत रचे गए हैं तो फिल्मों में भी सावन का उल्लेख करते हुए कई गीत लिखें गए हैं जो सुपर डुपर हिट हुए हैं।इन लोकगीतों और फिल्मी गीतों में प्रेयसी अपने पिया के घर आने की जहां बाट जोहते हुए बिरह ,तड़फ ,इंतजार की बात कहती है तो प्रियतम बारिश की बूंदों के माध्यम से ही न आ पाने के कारण अपने प्रेम का सन्देशा भेजता है जिससे उसकी बिरह की अग्नि शांत हो सके ।सावन का महीना आते वो दौर भी था जब पेड़ों के ऊपर झूले पड़ जाया करते थे ,जिन पर झूला झूलते हुए सखियाँ ,ननद ,भौजाइयां झूला गीत और कजरी की तान छेड़ते हुए अपने मन की बात कहा करती थी ।इस दौर में जब हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले जा रहे हैं तो इस स्थिति में परंपरागत झूलों का स्थान मेले ठेलों में लगने वाले मशीनी झूलों ने ले लिया है ।इस सब के बावजूद ग्रामीण इलाकों में आज भी पेड़ों पर पड़े झूले दिख जाते हैं जिन पर घर के कामकाज से फुर्सत मिलने के बाद झूला झूलने के लिए पहुँची किशोरियाँ ,महिलाएँ ,झूला गीतों ,कजरी की तान छेड़कर सावन का स्वागत करती है ,अपने मन की बात कहती हैं ।ऋतुराज बसन्त के बाद सावन ही ऐसा महिना है ,जो विरह की अग्नि जलाता और शांत करता है ,मस्ती बिखेरता है ,चहुँओर हरियाली बिखरी नज़र आती है ,पहाड़ों से झरते झरने प्रकृति की अद्भुत छटा ,नज़ारा उतपन्न करते हैं जिन्हें देखते ही मन उसमें खो जाता है ,आसमान में छाई घनघोर काली घटा ,और कड़कती चमकती बिजली सिहरन के साथ साथ प्रेम भी पैदा करती हैरायगढ़ में सावन के महीने में झूला डालने और झूला झूलने की वर्षों पुरानी परंपरा रही है ।यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं है कि हरियाणा ,राजस्थान ,यूपी और बिहार से आये हुए लोगों ने इस परम्परा में उत्साह ,उमंग का और अधिक रंग भरते हुए इसे निखार दिया ।रायगढ़ में वो भी दौर था जब सावन का महीना लगते ही घरों के अंदर ,आंगन के पेड़ों के ऊपर ,मोहल्लों में पेड़ों के ऊपर झूले पड़ जाया करते थे ।महिलाएं खासतौर पर तीजा के दिन उपवास रखा करती थी और झूला झूलते हुए सावनी गीत गाया करती थीं।रायगढ़ में अन्य मोहल्लों के अलावा गांधी गंज ,अनाथालय मंदिर ,और अन्य कुछ मंदिरों में झूला पड़ा करता था ।लेकिन अब कांक्रीट के उगते जंगलों के बीच हमारी यह परम्परा खोती चली जा रही है ।पुराने घरों में झूला डालने के लिए लगाई गई कुंडियां उदास रहकर ,मौन रहकर ,झूला झूलने की परम्परा की याद दिलाती रहती हैं तो उन पेड़ों की सुनी डालियां भी सावन में झूला पड़ने का इंतजार करती रहती है जिनके ऊपर कभी झूले पड़ा करते थे ।इन पेड़ों की पत्तियों को भी घूंघट धारी महिलाओं का इंतजार रहा करता है जिनके गीतों के सुर और तान को सुनकर ऊनके पत्ते भी डालकर हवा में सुमधुर संगीत उत्पन्न किया करते थे: *बगैर मेहंदी और कजरी के अधूरा है सावन **सावन की बात बगैर कजरी और मेहंदी के अधूरी ही रहा करती है उसके बगैर पूरी होने वाली नहीं है ।पिया मेहंदी लिया द ,मोतीझील से जाके साइकिल से ना छोटी ननदी से पिसा द, हमरे हथवा लगा द, कांटा कील से,जा के साइकिल से न!आज के दौर में मेहंदी अब कुटी -पिसी हुई सूखी मेहंदी प्लास्टिक के पाउच में पैक की हुई मिल जाती है ,लेकिन वो भी एक जमाना था जब मेहंदी के पत्तों को उसकी झाड़ियों से चुनकर लाना पड़ता था ,सील पर लोढ़े से महीन पीसकर उसे हाथों पर सजाना पड़ता था ।इस तरह तैयार की हुई मेहंदी से उसका जो रंग उभरता था उसका मुकाबला बाजार में मिलने वाली आज की रेडीमेड मेहंदी नहीं कर सकती ।गोरे गोरे हाथों में मेहंदी रचा के ,नैनों में कजरा डाल के चली दुल्हनियां पिया से मिलने छोटा सा घूँघट निकाल के

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