नए फ़सल के स्वागत और आपसी रिश्तों की मजबूती का प्रतीक ‘नुआ खाई’ तिहार

नुआखाई ओडिशा और छत्तीसगढ़ में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण फसल उत्सव है, जो धान की नयी फसल के स्वागत का प्रतीक है। नुआ का अर्थ है नया और खाई का अर्थ है भोजन, इसलिए इसका अर्थ ‘नया खाना’ है। इस दिन, परिवार और समुदाय एक साथ मिलकर प्रार्थना करते हैं और फसल का पहला चावल खाकर उत्सव मनाते हैं। यह त्योहार सामाजिक मेलजोल को बढ़ाता है
नुआखाई मुख्य रूप से एक कृषि त्योहार है, जो किसानों द्वारा नई फसल के लिए मनाया जाता है। यह त्यौहार लोगों को एक साथ लाता है, खासकर उन लोगों को जो काम के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। यह भाद्रपद महीने के पंचमी तिथि को मनाया जाता है, जो आम तौर पर गणेश चतुर्थी के अगले दिन, अगस्त और सितंबर के बीच आता है। यह पर्व सबसे पहले, देवताओं को मौसम की नई फसल का पहला प्रसाद चढ़ाया जाता है। परिवार के सदस्य मिलकर नए चावल का भोजन करते हैं, जिसे नवान्न कहते हैं। इस दिन मां समलेश्वरी की पूजा की जाती है, नए कपड़े पहने जाते हैं, और पारंपरिक भोजन तैयार किया जाता है।
नुआखाई पश्चिमी ओडिशा के लोगों का कृषि संबंधी त्योहार है। यह त्योहार पूरे ओडिशा में मनाया जाता है, लेकिन पश्चिमी ओडिशा के जीवन और संस्कृति में इसका विशेष महत्व है । यह अन्न की पूजा का त्योहार है। यह पर्व पश्चिम ओड़िशा के सीमावर्ती छत्तीसगढ़ में भी मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद, महासमुन्द, रायगढ़, जशपुर, धमतरी सहित बस्तर संभाग के कुछ जिले भी इनमें शामिल हैं, जहाँ पड़ोसी राज्य की तरह उत्कल संस्कृति से जुड़े लाखों लोग इसे पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ उत्साह से मनाते हैं। वर्षा ऋतु के दौरान भादों महीने के शुक्ल पक्ष में खेतों में धान की नई फसल, विशेष रूप से जल्दी पकने वाले धान में बालियां आने लगती हैं। तब नई फ़सल के स्वागत में नुआखाई का आयोजन होता है। यह कृषि संस्कृति और ऋषि संस्कृति पर आधारित त्यौहार है। इस दिन फसलों की देवी अन्नपूर्णा सहित सभी देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। सम्बलपुर में समलेश्वरी देवी, बलांगीर-पाटनागढ़ अंचल में पाटेश्वरी देवी, सुवर्णपुर (सोनपुर) में देवी सुरेश्वरी और कालाहांडी में देवी मानिकेश्वरी की विशेष पूजा की जाती है। पहले यह त्यौहार भादों के शुक्ल पक्ष में अलग-अलग गाँवों में अलग-अलग तिथियों में सुविधानुसार मनाया जाता था। गाँव के मुख्य पुजारी इसके लिए तिथि और मुहूर्त तय करते थे, लेकिन अब नुआखाई का दिन और समय सम्बलपुर स्थित जगन्नाथ मंदिर के पुजारी तय करते हैं। इस दिन गाँवों में लोग अपने ग्राम देवता या ग्राम देवी की भी पूजा करते हैं। नुआखाई के एक दिन पहले नये धान की बालियों के साथ चुड़ा (चिवड़ा ), मूंग और परसा पत्तों और पूजा के फूल खरीद लिए जाते हैं। नये धान के चावल को पकाकर तरह-तरह के पारम्परिक व्यंजनों के साथ घरों में और सामूहिक रूप से भी नवान्हभोज (नवान्नभोज) यानी नये अन्न का भोज बड़े चाव से किया जाता है। सबसे पहले आराध्य देवी-देवताओं को भोग लगाया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद ‘नुआखाई ‘ का सह-भोज होता है।
इस दिन के लिए ‘अरसा पीठा’ व्यंजन विशेष रूप से तैयार किया जाता है। नुआखाई त्यौहार के आगमन के पहले लोग अपने-अपने घरों की साफ-सफाई और लिपाई-पुताई करके नई फसल के रूप में देवी अन्नपूर्णा के स्वागत की तैयारी करते हैं।



