ओ बैलगाड़ी वाले गाड़ी धीरे हाँक रे : हर्ष सिंह

सुबह-सुबह गांधी पुतला चौक से गुजरते देखता हूं ,जगह -जगह मिट्टी के खिलौने बैल बिक रहे हैं।आज स्थानीय त्यौहार पोला बैला है,,बैलो की पूजा है ,आज बैल जगह जगह डर के प्रतीक बनते जा रहे हैं,उनकी उपयोगिता वो नहीं रही जो आज से चालीस पचास साल पूर्व हुआ करती थी। आज यदि हाली डे हो गया होता तो कितना मजा आता। इस नदी के तट पर घूमता जहां किसी जमाने में इस पार का सामान उस पार बैल गाड़ियों से होता। बहुएं अपनी ससुराल और मायेके बैल गाड़ी से जाती – आती। दो दिनों की बारिश के बाद नदी हरहरा के बह रही होगी। , ओपी चौधरी जी ने मैरिन ड्राइव बनाने का जो खाका खींचा है, जगदंबा मंदिर की ढलान से उतरकर ,और बहती नदी के समांतर सड़क का साथ पकड़ सर्किट हाउस निकल जाने की इच्छा है। नदी के संग- संग चलना आनंदित करता है, पर अभी बैलों की गाड़ी की स्मृति में सवार हो जाने की इच्छा है। कभी फिल्म नदियां के पार देखता था,जब भी देखता कुछ कुछ होने लगता, फैंटेसी सवार हो जाती और खुद को चंदन समझता था और तब कोई भी हम उम्र सुंदर लड़की दिख जाए उसे अपने कल्पना लोक में नायिका समझ कर गुनगुने लगता गाड़ी वाले गाड़ी धीरे चला,कभी सोचता वो पूछेगी ,कौन दिशा में लेकर चला रे,बटोहिया?पर फिजिक्स, मैथ्स की किताबें सब रोमांस का धुआं निकाल देती।उधर भी फेल होता इधर भी असफल होता,,। खैर हिंदी सिनेमा ने हमें प्यार की कल्पना करने के नये आयाम दिए पर आज मुझे बैल गाड़ीके खिलौने देख फणीश्वरनाथ रेणु आ रहे हैं उन्होंने “मारे गये गुलफाम “और “लाल पान की बेगम” लिखी जिसमें बैल गाड़ी केंद्रीय तत्त्व है। इस पर जो फिल्म बनी वो तीसरी क़सम थी ,-राजकपूर के पास कभी बैल हैं तो कभी जुगाड की गाड़ी,। अपनी खुद की बैल गाड़ी के लालच में दो पैसा कमा लेने की गर्ज से कभी चोरी का समान तथा कभी बांस लाद लेता है ,और जेल जाते बचता है तो कभी पीटा भी जाता है । अपमान से तंग होकर दो कसम खाते है पहला ,कभी चोरी का समान नहीं लादूंगा और दूसरा कभी बांस लेकर शहर नहीं जाऊंगा। तीसरी कसम बाकी है – एक दिन नौटंकी वाली बाई वहीदा रहमान गाड़ी में बैठ जाती है।उनकी खुशबू से राजकपूर अभिभूत हो जाते हैं, ।एक ग्रामीण जन का शहरी युवती से सच्चा निर्मल प्यार,। प्यार सर चढ़ के बोलता है ,उसके लिए झगड़ जाते हैं। कभी कोई उसे रंडी कह देता है तो कभी नौटंकी वाली वो उनके लिए पूरी भीड़ से भिड़ जाते हैं ,पर वो मेला खत्म होने पर शर्तों के अनुसार वापस लौट जाती है ।वो एक कलाकार हैं जिसे अब दूसरे मेला में जाना है।,तब दुःख में डूबें राज कपूर तीसरी कसम खाते हैं – अब किसी नौटंकी वाली बाई को अपनी गाड़ी में नहीं बैठाऊंगा। इसी तरह उनकी कहानी लाल पान की बैगम भी है।हम हिंदी भाषियों को अपने त्योहार के माध्यम से अपने लेखकों को याद करना चाहिए,। मुंशी प्रेमचंद की पंच परमेश्वर भी बैल को लेकर है।पोला बैला की शुभकामनाएं



