प्यार करना चाहता हूं मछलियों की तरह : हर्ष सिंह

भाषा की सीमा- रात से बारिश सुबह तक रूकी नहीं। जीवन ठहर स गया,लगता है। सब कुछ शीलन और गीलापन का शिकार लग रहा है। छाते की तलाश में रंगीन छाता हाथ लग जाता है। उसे लेकर मैं रोड से गणेश तालाब आ जाता हूं। फुहारें है ,और कभी- बड़ी बड़ी बूंदें भी। तालाब के चारों तरफ गोल घुमावदार सडक खाली है, कोई नहीं आया है,आया भी होगा कोई इक्का दुक्का तो किसी को न देख चला गया होगा। मैं धीरे धीरे ठहलना शुरू करता हूं। घर पर कोई काम नहीं है आज एक- एक पौधे, पत्तियों और जल में तैर रहे मछलियों,बतख,हंस, कबूतरों,फुदक रहे चूहे , खरगोश ,सबको बहुत ध्यान से देख सकता हूं। घंटों बिता सकता हूं। इतने सुंदर दृश्य को लिखना बहुत कठिन है। भाषा की सीमा है।भाषा यथार्थ को अभिव्यक्त करने का माध्यम है पर यथार्थ विराट है,सतत परिवर्तनशील है। पार दर्शी जल में तैरती मछलियों के झुंड दिखाई पड़ते हैं, कविता सूझती है- मैं मछलियों जैसा प्यार करना चाहता हूं, बाहरी आखेटक से बचकर। बतखो का झुंड चला जा रहा है सोचता हू- इसी तरह मैं भी जन गण में शामिल होना चाहता हूं। कबूतर एक -दूसरे पर लद कर दाना चुग रहे हैं – मुझे भी ऐसी मस्ती दे,,। तालाब के बीच बने छोटी सी बांस की कुटिया उसमें हंसों का परिवार – मैं भी किसी दिन अपनी हंसिनी और बच्चों के साथ छोटी सी कुटिया बनाऊ,। दृश्य पकड़ में नहीं आ रहे ,बस पाब्लो नेरुदा की कविता टुकड़े- टुकड़े में याद आती है – “बारिश में घर पर बैठने से ज्यादा खराब कुछ भी नहीं,”,क्यों न इस तलाब को छोड़कर दूसरे तालाब चला जाऊं। कभी अनुपम मिश्र की किताब पढ़ा था – आज भी खरे हैं तालाब,,,तालाब के किनारे अप्राकृतिक चिप्पी में नैतिक वचन लिखा है – मेहनत से सब कुछ मिल जाता है,, प्रकृति के इस आनंद को पाने के लिए मैं सिर्फ छाता लेकर आ गया हू और आनंदित हूं,,। दो मछलियां एक साथ तैरती चली जा रही है – अपनी भाषा की सीमा में यही पंक्ति सूझ रही है – मैं प्यार करना चाहता हूं , मछलियों की तरह,,।



