रायगढ़

रायगढ़ में जन्माष्टमी मेला (झूलोत्सव) का 75 वर्ष पुराना है इतिहास,श्याम मंदिर को भी जन्माष्टमी मनाते हो गए 27 साल

रायगढ़ की धार्मिक ,सांस्कृतिक ,अतिथि सत्कार की विरासत ,धरोहर और पहचान है जन्माष्टमी मेला जिसे की झूलोत्सव के रूप में मनाया जाता है । जन्माष्टमी मेले की भव्यता के कारण रायगढ़ का नाम दूर दूर तक प्रसिद्ध हुआ था और इसे देखने के लिए पड़ोसी राज्य उड़ीसा के अलावा,बंगाल ,बिहार ,महाराष्ट्र से भी रायगढ़ आया करते थे । मेले के कारण होने वाली भीड़ के चलते रायगढ़ की सड़कों ,गलियों पर पैर रखने की भी जगह नहीं बचा करती थी ,लोगों के घर ,आंगन ,परछी मेला देखने आए मेहमानों ,दर्शनार्थियों ,मेलार्थियों से भर जाया करते थे ।मेले के सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र गोरी शंकर मंदिर में लगने वाली झांकिया हुआ करती थी।
सेठ किरोड़ीमल ने 1946 में मंदिर का निर्माण शुरू किया था ,हरियाणा से मंदिर निर्माण के कारीगर आये थे,1948 में प्राण प्रतिष्ठा हुई ।प्रसिद्ध चित्रकार सत्यम ने मंदिर के अंदर दीवालों पर पौराणिक कथाओं के चित्र बनाये थे। दानवीर सेठ किरोड़ीमल द्वारा रायगढ़ की तरह हरियाणा के भिवानी में भी श्री गौरीशंकर मंदिर का निर्माण कराया गया था

झूलोत्सव के नाम से गौरीशंकर मन्दिर में जन्माष्टमी मनाए जाने की परंपरा 1951 में प्रारम्भ हुई थी ।इसके पीछे स्व सेठ किरोड़ीमल की सोच यह थी कि रायगढ़ में भी जन्माष्टमी मथुरा की तर्ज पर मनायी जाए और हुआ भी ऐसा रायगढ़ में मनायी जाने वाली जन्माष्टमी दूर -दूर तक प्रसिद्ध हो गई और इसे देखने के लिए आसपास के लोगों के अलावा दूसरे राज्यों के लोग भी आने लगे और रायगढ़ में जन्माष्टमी के अवसर पर भारी भीड़ उमड़ने लगी जिसने कि एक मेले का रूप धारण कर लिया ।1955 से जन्माष्टमी मेला के अवसर पर रायगढ़ में सर्कस और मीना बाजार लगने के अलावा बाहर से व्यापारी आकर मेले में अपनी दुकान सजाने लगे ।
रायगढ़ में जन्माष्टमी मेले के दौरान बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को लाने लेजाने के लिए रेलवे द्वारा जहां स्पेशल ट्रेन चलाई जाती थी तो राज्य परिवहन निगम भी अतिरिक्त बसें मेला स्पेशल के रूप चलाया जाता था ।इस दौरान रायगढ़ के सिनेमा घरों द्वारा धार्मिक फ़िल्म लगाई जाती थी और कई शो चलाये जाते थे ।कहा जाता है कि जन्माष्टमी मेला के दौरान रायगढ़ में कोई घर नहीं बचता था जो मेहमानों से भरा नहीं होता था ,यहां तक कि अनजान लोग भी घरों के बाहर की परछी में अनजान लोग भी डेरा जमा लिया करते थे और उनका भी पूरा ध्यान घर के लोग रखा करते थे ।
जन्माष्टमी मेले के दौरान रायगढ़ में जगह -जगह भोजन ,पानी ,नाश्ते की व्यवस्था रायगढ़ की सेवाभावी संस्थाए किया करती थी और अब भी किया करती हैं ।रायगढ़ के लोगों द्वारा सेवा और सत्कार करना रायगढ़ की वर्षों पुरानी संस्कृति की है।
प्रसिद्धि ख्याति की चरम सीमा पर पहुंचने के बाद रायगढ़ का जन्माष्टमी मेला ट्रस्ट की उपेक्षा , गौरीशंकर मन्दिर के अंदर धार्मिक कथाओं पर आधारित झांकियों के पुरानी पड़ने पर समय के साथ उसमें भी परिवर्तन किया जाता रहा है।

(श्री श्याम मंदिर)
जब रायगढ़ का जन्माष्टमी मेला अपनी प्रसिद्धि और वैभव की ढलान में था तब उस दौर में 27 वर्ष पहले रायगढ़ के श्री श्याम मण्डल ने श्री श्याम मन्दिर के तत्वाधान में जन्माष्टमी मनाने का निर्णय कर जन्माष्टमी मनाना आरम्भ कर दिया गया और श्री श्यामण्डल द्वारा मनाई जाने वाली जन्माष्टमी ने रायगढ़ में मनाई जानी वाली जन्माष्टमी को एक नयी पहचान दी और श्री श्याम मण्डल द्वारा मनाई जाने वाली जन्माष्टमी भी रायगढ़ में प्रसिद्ध हो गयी।

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