
छत्तीसगढ़ की संस्कृति और परम्परा में ‘भोजली पर्व’का अपना एक अलग स्थान और विशिष्ट महत्व है ।भोजली पर्व रक्षा बंधन के अगले दिन मनाया जाता है ।इस दौरान ईश्वर से अच्छी फसल की कामना की जाती है तो इस अवसर पर मितान और मितानिन बदने वाले लोग पूजापाठ के साथ आपस में एक दूसरे के गले मिलकर इसे बदते हैं और जीवन भर इसे निभाने का संकल्प भी लेते हैं।
भोजली पर्व का इतिहास आल्हा ,ऊदल मलखान और पृथ्वीराज चौहान के बीच हुई एक लड़ाई से भी जुड़ा हुआ बताया जाता है जिसमें आल्हा ऊदल को विजय श्री हासिल हुई थी।
भारत के कई राज्यों में सावन महीने की सप्तमी को बांस से बनी ,या प्लास्टिक की छोटी॑-छोटी टोकरियों में मिट्टी ,खाद डालकर उसमें गेहूं या जौ बो दिया जाता है जिस टोकरी या डलिया में इसे बोया जाता है उसे घर के किसी पवित्र स्थान में छायादार जगह में रखा जाता है। उनमें रोज़ पानी दिया जाता है और, महिलायें उसकी पूजा करती हैं एवं भोजली देवी के आदर सम्मान भोजली सेवा गीत गाये जाते हैं।
देवी गंगा-देवी गंगा ,लहर तुरंगा हो लहर तुरंगा!
हमरो भोजली दाई के भीजे आठों अंगा, हा हो देवी गंगा..
रूठों को मनाने और नए दोस्त बनाने ,मितान मितानिन ,महाप्रसाद ,सखी ,गियां बनाने के लिए भी इस पर्व का विशेष महत्व है। रक्षाबंधन के अगले दिन नगर ,कस्बे ,गांव की नदी, तालाबों पर महिलाओं की भारी भीड़ भोजली को उनके जल में विसर्जन करने के लिए पहुंचती है।
भोजली का विसर्जन करने के बाद जब लोग घर वापस आते हैं तो अपने से बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
गणेश उत्सव में भी भोजली की छटा दर्शनीय होता है, भोजली के लिए मिट्टी लाने से लेकर उसमें मिट्टी साफ करने, बीज डालने तथा हर दिन कोपलों पर हल्दी के घोल छिड़कने तथा देवी का रूप मानकर भोजली की सेवा सब के अलग गीत होते हैं, जिन्हें गाँव में पुरानी पीढ़ी की महिलाएं अच्छी तरह गाती हैं।
रायगढ़ के पुराने लोग बताते हैं कि राखी के अगले दिन महिलाएं जयसिंह तालाब ,गणेश तालाब ,बूढ़ी माई तालाब ,बाघ तालाब में भोजली विसर्जन के लिए जाया करती थीं ।सर्वाधिक भीड़ बाघ तालाब में हुआ करती थी जहां पर की राज परिवार की महिलाएं भी भोजली विसर्जित किया करती थी और उनके साथ दूसरी महिलाएं भी जाया करती थी ।
लेकिनअब यह सब बीते दिनों की मात्र यादें बनकर रह गया है ।ग्रामीण इलाकों में अब भी इस परम्परा का निर्वहन हो रहा है और भोजली तिहार मनाया जाता है।



