ग्रीन सस्टेबल की जनसुनवाई के खिलाफ अड़े ग्रामीण, ई आई ए रिपोर्ट में हैं कई खामियां,चौकानें वाले तथ्य आये सामने

रायगढ़ 15 नवम्बर ।सारंगढ़ में ग्रीन सस्टेबल कंपनी कोे आवंटित लालाधुरवा-जोगनीपाली लाइम स्टोन खदान के लिए आगामी 17 नवम्बर को प्रस्तावित जनसुनवाई के खिलाफ प्रभावित गांव के ग्रामीण पूरी तरह से लामबंद हो गए हैं. ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि लाइम स्टोन खदान से क्षेत्र में विकास नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ विनाश होगा और आबोहवा सांस लेने के लायक तक नहीं रह जाएगी. ऐसे में अगर जनसुनवाई को निरस्त नहीं किया जाता है तो वे सड़क पर उतर कर उग्र आंदोलन करेंगे।
अविभाजित रायगढ़ जिले के खासकर सारँगढ़ क्षेत्र में लाइमस्टोन का विशाल भंडार मौजूद है जिस पर अब बड़े बड़े उद्योगपतियों की गिद्ध दृष्टि पड़ चुकी है ताकि उसे वो निकालकर सीमेंट उत्पादकों को बेचकर मोटा मुनाफा कमा सकें. इसी कड़ी में अब सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले में लालाधुरवा-जोगनीपाली लाइम स्टोन खदान के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति हासिल करने आगामी 17 नवंबर को जनसुनवाई आयोजित की गई है। यह खदान मेसर्स ग्रीन सस्टेबल मैन्युफेक्चिरिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड भुवनेश्वर को आवंटित की गई है। इस खदान से सारंगढ़ ब्लॉक के पांच गांव लालाधुरवा, जोगनीपाली, धौराभांठा, कपिस्दा और सरसरा प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे में प्रभावित गांव के लोग किसी भी क़ीमत पर अपनी जमीन उद्योग को नहीं देना चाह रहे हैं और लगातार जनसुनवाई को निरस्त करने कि मांग को लेकर अड़े हुए हैं, गुरुवार को अपनी मांगों को लेकर शताधित ग्रामीण महिला पुरुषों ने सारंगढ़ कलेक्टर कार्यालय का घेराव भी किया था. ग्रामीणों का कहना है कि ग्रीन सस्टेबल की जनसुनवाई यदि स्वीकृत हो जाती है और उसे लाइमस्टोन के उत्खनन की अनुमति मिल जाएगी और कम्पनी वहां पर सात सौ टन प्रति घण्टे की क्षमता वाला क्रशर लगाएगी जो 24 घण्टे में 16 हजार 800 टन स्टोन का क्रशर करेगा. इसके अलावा इस लाइम स्टोन की ट्रांसपोर्टिंग के लिए 1000 से भी अधिक डंफरों के सड़क पर दौड़ने लगेंगी. उत्पादन क्षमता से सहज अनुमान लगा जा सकता है कि स्टोन के क्रशिंग से कितनी बड़ी मात्रा में डस्ट का बवंडर उत्पन्न होगा जोकि आसमान से आने वाली सूरज की किरणों को भी एक बारगी ढक लेगा ।यह डस्ट उड़कर जब खेतों में गिरेगी जो खेतों की उपजाऊ क्षमता के साथ साथ फसलों में अंकुरण क्षमता को भी प्रभावित करेगी । इसी के साथ क्रशर का पेट भरने के लिए बड़े पैमाने पर उत्खनन होगा जिसके कारण विस्फोटों से सारा प्रभावित क्षेत्र दरक और दहल जाएगा। इस खदान के चालू होने और स्टोन के क्रश होने से जो दृश्य दिखाई देगा वो टिम्बर लगा से भी अधिक हाहाकारी हो सकता है । डस्ट से सांस की बीमारी के साथ दमा और फेफड़े सम्बधी बीमारी भी बढ़ेगी. उपर्युक्त सभी चिंताओं से ग्रसित और आशंकित होकर ग्रामीणों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है।
कम्पनी द्वारा जो ई आई ए रिपोर्ट पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए पेश की गई है उसमें काफी झोलझाल और तथ्य रखे जाने की बात ग्रामीणों द्वारा कही जा रही है जैसे कृषि भूमि ,पेड़ों की वास्तविक संख्या ,वन्य पशुओं की प्रजातियों ,आबादी ,उपजाऊ भूमि को बंजर बताना ,उपलब्ध जल स्रोतों को नहीं बताया जाना आदि शामिल है।



