रायगढ़

पुरूंगा में मेसर्स अंबुजा सीमेंट अडानी को आवंटितकोल ब्लॉक के विरोध में कलेक्टोरेट पहुंचे ग्रामीण ,11 नवम्बर को आयोजित जनसुनवाई निरस्त किये जाने की मांग

रायगढ़। धरमजयगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम पुरंगा में मेसर्स अंबुजा सीमेंट लिमिटेड अडानी को आवंटित कोल माइंस के लिए आने वाले 11 नवंबर को आयोजित जनसुनवाई के विरोध में क्षेत्रीय ग्रामीण एकजुट हो गये हैं और जनसुनवाई के विरोध में सड़क पर उतर आये हैं। बुधवार को धरमजयगढ़ विधायक के नेतृत्व में कोल ब्लॉक से प्रभावित होने वाले गांवों के शताधिक महिला-पुरूष रायगढ़ कलेक्टोरेट पहुंचे और जनसुनवाई को निरस्त करने की मांग करते हुए कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि अगर ये जनसुनवाई निरस्त नहीं की गई तो आगे वे उग्र आंदोलन तक करने को तैयार हैं।


रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के पुरंगा में अडानी कंपनी यानी मेसर्स अंबुजा सीमेंट लिमिटेड को कोल ब्लॉक का आवंटन किया गया है। इस खदान से लगभग 10 गांव प्रभावित होंगे जबकि पांच से छह गांव पूरी तरह से इसकी जद में आ जायेंगे। यही वजह है कि क्षेत्रीय ग्रामीण इस कोल ब्लॉक का पूरजोर विरोध कर रहे हैं और प्रस्तावित कोल ब्लॉक के लिए आगामी 11 नवंबर को होने वाले जनसुनवाई को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। इसके तहत बुधवार को धरमजयगढ़ विधायक के नेतृत्व में प्रभावित गांवों के शताधिक ग्रामीण महिला-पुरूष रायगढ़ पहुंचे और कलेक्टोरेट जाकर कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा। ग्रामीणों का कहना है कि यह खदान ग्राम पंचायत तेन्दुमुड़ी, पुरुंगा और साम्हरसिंघा के क्षेत्र को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करेगी। ऐसे में पेशा कानून के तहत विशेष ग्राम सभा में ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से मेसर्स अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड, पुरुंगा की प्रस्तावित भूमिगत कोयला खदान परियोजना के विरोध में प्रस्ताव पारित करते हुए आगामी 11 नवंबर को निर्धारित पर्यावरणीय जनसुनवाई को निरस्त करने का निर्णय लिया है। इसके बावजूद अगर शासन-प्रशासन की ओर जनसुनवाई को निरस्त नहीं की जाती है तो वे आगे उग्र आंदोलन करने तक को बाध्य होंगे। ग्रामीणों का कहना है कि पुरूंगा कोल ब्लॉक के लिए कंपनी को प्रस्तावित भूमि में 621.331 हेक्टेयर वन भूमि, 26.898 हेक्टेयर गैर-वन भूमि, और 220.796 हेक्टेयर निजी भूमि शामिल है। जिसके अंतर्गत कोकदार आरक्षित वन क्षेत्र है जो कि काफी घना जंगल है और जंगली हाथियों का स्थायी रहवास भी है। भूमिगत खदान लगने से यहां जलस्तर के गिरने और जलस्त्रोत के सूखने, पर्यावरणीय असंतुलन बनने का खतरा है। इस क्षेत्र में साल 2001 से अब तक 167 ग्रामीणों की मौत हाथियों के हमले से हो चुकी है जबकि 69 हाथी भी काल कलवित हो चुके। ग्राम वासी जंगल और हाथियों की रक्षा के प्रति सजग हैं और किसी भी खदान की गतिविधि का वे विरोध करेंगे।

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