
भारत एक कृषि प्रधान देश है ।कृषि के क्षेत्र में बैलों की अहम भूमिका रही है। खेतों की जोताई ,बोवाई ,सिंचाई से लेकर फसलों की मिसाई तक में बैल अपने श्रम के जरिये किसानों को सहयोग देते आये हैं ।इतना ही नहीं बैल गाड़ी के माध्यम से सामान और फसलों की धुलाई हो या यात्रा हो सभी मे बैलों का योगदान रहा है ।भले ही आज के दौर में बैलों का स्थान ट्रेक्टर लेते जा रहे हों इसके बावजूद खेती के क्षेत्र में बैलों की उपयोगिता बनी हुई है। बैलों के इस उपकार ,योगदान का आभार व्यक्त करने के लिए ही पोला तिहार मनाया जाता है ।छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में मनाया जाने वाला पोला तिहार सिर्फ एक तिहार ही नही बल्कि यह किसान और बैलों के बीच अटूट सम्बन्ध को अभिव्यक्त करने का परिचायक भी है। इस साल शनिवार यानी 23 अगस्त को पोला त्यौहार मनाया जा रहा है . पोला से पहले ही रायगढ़ के बाजार में मिट्टी के बर्तन और बैल सजाए गए थे. पोला पर्व पर किसान बैलों की विशेष रूप से पूजा करते हैं. इस अवसर पर बैलों का श्रृंगार किया जाता है. साथ ही कहीं कहीं बैल दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पोला त्योहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है, प्राचीनकाल से चली आ रही परंपरा का निर्वहन करते हुए आज भी ग्रामीण अंचलों में पोला त्यौहार पूरे उत्साह और लगन के साथ मनाया जाता है।
पोला त्यौहार को लेकर शहर में भी बाजार सज चुका है। मिट्टी से बने पोला यानी बैलों की खूब खरीददारी हो रही है। बाजार में रंग-बिरंगे मिट्टी के बैल को आकर्षक ढंग से सजाकर लाया गया है। चूंकि पोला त्यौहार में बच्चे इन मिट्टी के बैलों की पूजा कर मोहल्लों में घुमाते हैं और इससे उनका मनोरंजन भी होता है लिहाजा पोला बैला खरीदने के लिए काफी लोग पहुंच रहे हैं। बैल को भगवान का स्वरूप माना जाता है और इस वजह से इसकी पूजा की जाती है। परंपरा अनुसार हरेली त्यौहार के दिन दीवारों में हल चलाते किसान और बैलों के चित्र को प्रतीकात्मक तौर पर उकेरा जाता है और पूजा की जाती है और इसे पोला त्यौहार के दिन पूजा करके आभार जताते हुए अगले साल आने के लिए निमंत्रण दिया जाता है. छत्तीसगढ़ मे खासतौर पर बैल इसी तरह पूजे जाते हैं. पोला पर्व पर किसान बैलों की खास तौर से पूजा करते हैं. खेती किसानी में बैलों का सबसे अहम काम होता है. पोला पर्व पर किसान बैलों की पूजा कर उनके प्रति सम्मान जताते हैं.

चूंकि पोला त्यौहार में गुचकलिया बनाने की पुरानी परंपरा चली आ रही है ,तो इस दिन ग्रामीण क्षेत्रों में घरों में विशेष रूप से पूजा के लिए गुचकलिया बनाए जाते हैं, साथ ही त्यौहारों ने बनाए जाने वाले अन्य पारंपरिक छत्तीसगढ़ी व्यंजन ठेठरी, खुरमी, लौंग लता, अईरसा, लड्डू, केरा झूल जैसे व्यंजन इस त्यौहार की शोभा बढ़ाते हैं



