रायगढ़

चार लिहा गे चार ,अब यह स्वर सुनाई नहीं देते

रायगढ़ ।चैत,वैशाख की तपती दुपहरिया में जैसे ही चार लिहा गे चार का स्वर सुनाई देता था तो फिर हम अपने बचपन में घर से बाहर निकलकर उस ग्रामीण महिला के पास पहुंच जाया करते थे जो निकटवर्ती किसी जंगल से घिरे गांव से एक झौआ में सरई पान के दोने में चार भरकर बेचने के लिए आया करती थी।साइकिल चलाकर जंगल में जाकर चार खाने का मजा तो निराला ही था।लेकिन अब रायगढ़ के आसपास के जंगलों में चार के पेड़ ढूंढने से भी नहीं मिलते हैं ।
चार का खट्टा मीठा स्वाद लेने के बाद उसके बीज को सुखाने के लिए रख लिया जाता था और जब यह अच्छी तरह से सूख जाता था तब उसे फोड़कर उसके अंदर से चिरौंजी निकाल ली जाती थी फिर उसका आनन्द लिया जाता था ।
जिन जंगलों में चार के पेड़ों की बहुतायत है वहां के आसपास के गांवों में रहने वाले लोग चार का संग्रहण करके उसके अन्दर से चार बीज निकालकर उसे धोकर सुखाकर व्यापारियों को बेच दिया करते हैं जिससे उन्हें अच्छी खासी आय प्राप्त हो जाया करती है ।धर्मजयगढ़ और लैलूंगा क्षेत्र के जंगलों में चार के पेड़ अभी भी पाए जाते हैं लेकिन रायगढ़ के जंगल में यह ढूंढने से मिल पाए ।चार के संग्रहण के लिए चार के पेड़ों को काट देना इसके लिए प्रमुख रूप से जहां जिम्मेदार हैं वही वन विभाग को भी जंगलों में चार का प्लांटेशन करने पर ध्यान देना होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button