रायगढ़ में रास गरबा का इतिहास 104 साल पुराना ,जयराम कॉलोनी और हनुमान गुड़ी में दिखती है रास गरबे की संस्कृति और परम्परा

रायगढ़ ।रायगढ़ में शारदीय नवरात्रि के अवसर पर गरबे की भी धूम रहा करती है। रेलवे कॉलोनी के निकट स्थित जयराम कॉलोनी में निरंतर 104 वर्ष से रास गरबा का आयोजन होता आ रहा है हनुमान गुड़ी में भी इसके आयोजन लगभग 50 वर्ष से होता आ रहा है ।
रायगढ़ में दुर्गा पूजन समारोह एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। जिसकी चर्चा पूरे छत्तीसगढ़ में हुआ करती है ,इस साल भी नवरात्रि को लेकर यहां भव्य तैयारी को देखने को मिल रही है। नवरात्रि की शुरूआत से ही समूचा शहर माता रानी मां अंबे की आराधना और उपासना में लीन हो हो जाता है ।
नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना के लिए रास गरबा करने की भी परंपरा है हालांकि यह गुजरात की संस्कृति से जुड़ा हुआ है मगर रायगढ़ में पिछले 104 सालों से गुजरात से यहां आकर बसे जयरामवालजी परिवार द्वारा इस परंपरा को यहां न केवल जीवंत कर रखा हुुआ है बल्कि हर साल शारदीय नवरात्रि पर इसका सफल आयोजन भी किया जाता है जिसमें सैंकड़ों की संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इसके अलावा पिछले तकरीबन 50 सालों से सुभाष चौक स्थित हनुमानगढ़ी मंदिर में नवरात्रि पर गरबा खेलने की परंपरा चली आ रही है।
नवरात्रि पर गरबा परंपरा देवी दुर्गा की आराधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो गुजरात से शुरू होकर भारत के कई प्रान्तों में फैली है।गुजराती जहां जहां गए वहां वहां अपनी इस परंपरा और संस्कृति को भी साथ लेते गए और अब पूरे क्षेत्र में लोकप्रिय हो गई है। इसमें देवी दुर्गा की स्तुति में नृत्य किया जाता है और उनकी उपासना की जाती है। गरबा नृत्य को जीवन के चक्र और देवी की असीम शक्ति का प्रतीक माना जाता है। गरबा नृत्य मां दुर्गा को प्रसन्न करने और उनकी शक्ति की आराधना करने का एक तरीका है। इसमें गर्भा नामक मिट्टी के मटके में दीपक जलाया जाता है, जिसके चारों ओर गोल घेरे में गरबा किया जाता है। यह मटका मां शक्ति का प्रतीक है और उसका गोल घेरा ब्रह्मांड के निरंतर चलने वाले चक्र को दर्शाता है। रायगढ़ में इसे केवल नृत्य नहीं, बल्कि सनातनी परंपरा, आस्था और संस्कृति का उत्सव माना जाता है। आज से तकरीबन 104 साल पहले सन् 1921 में गुजरात से आकर यहां बसे श्रीजयराम वालजी परिवार ने रायगढ़ में आकर नवरात्रि पर गरबा परंपरा की शुरूआत की और सौ साल से अधिक का समय व्यतीत होने के बाद भी मां अम्बे की आराधना में किये जाने वाले इस गरबे की खुशबू यहां की फिजाओं में फैली हुई है। हर साल श्रीजयराम वालजी कॉलोनी में गरबा सजाया जाता है और गुजराती समाज के साथ ही अन्य समाज के लोग वहां भरे श्रद्धाभाव के साथ इस गरबा में शामिल होकर माता रानी की आराधना करते हैं। हालांकि पहले इसमें शामिल होने के लिए गुजरात से भी काफी संख्या में लोग पहुंचते थे मगर अब उनकी संख्या कम होते जा रही है। श्री जयराम वालजी द्वारा शुरू की गई इस परंपरा को उनका परिवार अब तक कायम रखे हुए है और पीढ़ी दर पीढ़ी हर साल इसके आयोजन का जिम्मा उठा रहा है। हालांकि बदलते दौर में अब गरबा का ट्रेंड भी बदलता जा रहा है। अब लोग फिल्मी धुनों पर गरबा करने लगे हों मगर श्रीजयराम वालजी परिवार द्वारा आयोजित किये जाने वाले गरबा में आज भी गुजरात की संस्कृति और परंपरा दिखलाई पड़ती है।
शारदीय नवरात्रि में जयरामवालजी कॉलोनी के बाद अगर कहीं रास गरबा की धूम रहती है तो वो है शहर के बीच स्थित हनुमानगुड़ी में हुआ करती है। सुभाष चौक स्थित हनुमान मंदिर में भी हर साल पूरे भक्ति भाव के साथ मां दुर्गा की आराधना करने के लिए गरबा का आयोजन किया जाता है जिसमें काफी संख्या में शहरवासी शामिल होते हैं। हनुमानगढ़ी में गरबा की शुरूआत करने के पीछे भी जयरामवालजी कॉलोनी में आयोजित होने वाला गरबा ही कारण है। दरअसल, 30 और 40 के दशक में जयरामवालजी कॉलोनी में गरबा करने के लिए इस कदर भीड़ उमड़ पड़ती थी, इस भीड़ को मेंटेन करने के लिए ही हनुमान मंदिर में विशेष तौर पर सांवरिया परिवार द्वारा गरबा करने के लिए एक मंच तैयार करवाया गया जहां पिछले तकरीबन 50 सालों से हर शारदीय नवरात्रि पर गरबा का आयोजन किया जाता है।
रायगढ़ में नवरात्रि के दौरान जगह-जगह गरबा और डांडिया का आयोजन होता है, जो भक्ति, संस्कृति और समुदाय को जोड़ता है। इन आयोजनों में महिला, पुरुष और युवा भक्ति और उत्साह के साथ भाग लेते हैं, और देर रात तक नृत्य करते हैं। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान पहनकर लोग इस उत्सव को और भी जीवंत बनाते हैं। इस साल भी इसके लिए जगह-जगह तैयारियां शुरू कर दी गई है।



