जंगली हाथियों को इंसानी बस्ती से दूर रखने करने होंगे ठोस उपाय ,एक जंगल से दूसरे जंगल में खदेड़कर ,ग्रामीणों को जंगल में ना जाने की सलाह देकर वन विभाग कर लेता है अपने कर्तव्य की इतिश्री ,हाथी दल से बिछड़ा नहीं करता

रायगढ़ 12 अगस्त। पिछले कुछ अरसे से अविभाजित रायगढ़ जिले जंगली हाथियों के आतंक से थर्रा उठा है । आये दिन इस तरह की घटनाएं प्रकाश में आ रही है जिसमें जंगली हाथी जंगल से निकलकर गांवों में धावा बोल रहे हैं जिसमें वो भोजन की तलाश में किसी का घर तहस -नहस कर रहें तो कोई सामने पड़ जा रहा है तो सूंड से उठाकर उसे उसे पटककर ,अपने पैरों से कुचलकर उसे इहलोक पहुंचा दे रहें है , तो इंसानों ने कई हाथियों को उनसे अपनी फसल बचाने के लिए मारा है । पिछले दिनों तो जंगली हाथी रायगढ़ शहर के अंदर स्थित नगर वन तक में पहुंच गए थे जहां से उन्हें खदेड़ा गया था ।

जंगली हाथियों का अविभाजित रायगढ़ जिले से रिश्ता सदियों पुराना है ।मुगल काल में सरगुजा क्षेत्र से जंगली हाथियों को पकड़कर मुगल सेना में शामिल किया जाता रहा है । सन 1920 30 तक जंगली हाथियों की आवाजाही अविभाजित जशपुर ,रायगढ़ के जंगलों तक होती रही थी लेकिन उसके बाद किन्हीं कारणोंवश वह थम गई थी ।1986 -87 में 50 साल बाद जंगली हाथियों ने झारखंड और सरगुजा के रास्ते जंगली हाथी अपने पुराने प्रवास के मार्ग पर एक बार फिर से अविभाजित रायगढ़ जिले के जंगलों में पहुंचे थे और उनकी चिंघाड़ों से जशपुर क्षेत्र के जंगल गूंज उठे थे और देखते ही देखते पूरे रायगढ़ जिले के घने जंगलों में जंगली हाथी पूरी आजादी और मस्ती के साथ विचरण करने लगे अब तो रायगढ़ जिला खासकर धर्मजयगढ़ और घरघोड़ा का वनांचल जंगली हाथियों का स्थायी डेरा बन चुका है ।उस दौर से लेकर अब तक आये दिन जंगली हाथियों द्वारा लोगों को कुचलने की खबर आया करती हैंहाथियों ने ने जंगलों के अंदर भोजन कम होने पर जंगलों से सटे गांव में भोजन की तलाश में पहुंचे और महुये की गमक और कटहल की महक ,धान ,चावल के स्वाद से आकर्षित गांवों के घरों में भी धावा बोला है ।पिछले 35 सालों से लगातार यह सिलसिला चलता आ रहा है ,जंगली हाथियों से बचाव के लिए शासन द्वारा कई उपाय भी किये गए ,हाथी प्रभावित क्षेत्र में लोगों को सजग ,चौकस और जागृत भी किया गया ।हाथियों का प्राकृतिक रहवास वो जंगल हुआ करते हैं जहां पर्याप्त हरियाली और पानी उपलब्ध हो इसीलिए हाथियों को भी रायगढ़ जिले के जंगल रास आ गए हैं और उंन्होने अब यहां लगभग अपना स्थायी डेरा लगा लिया है और लगातार इनकी संख्या बढ़ती जा रही ये जंगली हाथी अब जानेवाले नहीं हैं जिसे देखते हुए इंसान को हाथियों के संग रहने और जीने का तरीका सीखना होगा। *हाथी दल से बिछड़ता नहीं हैं*हाथियों के दल पर प्रमुख मादा का नियंत्रण होता है नर शावक 12 -15 का होने तक दल के साथ बना रहता है उसके बाद वह वयस्क होने पर उसकी भी साथी की तलाश शुरू होती है ऐसी स्थिति में भी वो दल से खुद बाहर चला जाता है या फिर मादा के लिए उसे दल के प्रमुख नर हाथी की चुनोती का सामना करना पड़ता है ,इस संघर्ष में जो विजयी होता है वो दल में बना रहता है और जो हारता है उसके सामने दो रास्ते होते है या तो वो दल छोड़कर खुद बाहर चला जाये या फिर प्रमुख नर की आधीनता स्वीकार कर के दल में बना रहे लेकिन अधिकतर दल से बाहर जाना पसंद करते हैं ।*मदकाल में हाथी के व्यवहार में परिवर्तन**जंगली हाथियों द्वारा अधिकतर जो हिंसक घटनाएं की जाती हैं वो उसके मदकाल के दौरान की जाती हैं ,इस काल में हाथी ,गुस्सेल ,चिड़चिड़े स्वभाव का हो जाता है उसकी तरफ इस दौरान जो बढ़ता है या सामने पड़ जाता है मदमस्त हाथी उस पर हमला करता है। यहां तक कि मदकाल के दौरान पालतू हाथी को सम्हालना भी काफी मुश्किल हुआ करता है ।हाथियों में मदकाल तीन तीन माह तक बना रह सकता है ।वर्ष ऋतु के मध्य से लेकर अंतिम चरण में मादा हाथी में गर्भ धारण की इच्छा होती है और इसके लिए वो नर हाथी को आकर्षित करने के लिए गन्ध छोड़ा करती हैं ।



