रायगढ़

रायगढ़ में भी बसा है एक ‘ईरानी’ मोहल्ला ,कभी घूमंतू व्यापारी रहे,अब शहर की जिंदगी का हिस्सा

(हरेराम तिवारी)
रायगढ़ ।आज जब पश्चिम एशिया में तनाव की आहटें तेज हो रही हैं और ईरान-पश्चिमी देशों के रिश्तों पर पूरी दुनिया की नजर टिकी है, तब भारत की मिट्टी में रचे-बसे उन ईरानी मूल के परिवारों की कहानी फिर से प्रासंगिक हो उठती है। सदियों पहले समुद्री रास्तों से सौदागर बनकर आए ये लोग समय के साथ यहीं बस गए—रोजगार बदले,शहर बदले,लेकिन अपनी जड़ों की खुशबू और भारतीयता की गर्माहट दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ते रहे।आज उनकी जिंदगी में ईरानी परंपराओं की झलक भी है और भारतीय संस्कृति का अपनापन भी,मगर एक सच सबसे ज्यादा साफ दिखाई देता है—पीढ़ियां बदल गईं, पहचानें बदल गईं, पर उनका दिल अब पूरी तरह भारत के लिए ही धड़कता है।
रायगढ़ शहर में एक ऐसा मोहल्ला है जहाँ कदम रखते ही एक अलग संस्कृति की झलक दिखाई देती है। यहाँ रहने वाले लोग खुद को ईरानी मूल का बताते हैं और उनकी जीवनशैली, बोली-भाषा और परंपराएँ आज भी उस पहचान को संजोए हुए हैं। शहर के मिट्ठुमूड़ा इलाके में बसे इस छोटे से समुदाय की कहानी मेहनत, संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की मिसाल है।
करीब 60 वर्षीय तबरु बेगम और 80 वर्षीय निसार अली बताते हैं कि उनके पूर्वज लगभग 200 साल पहले समुद्री जहाज से सौदागर बनकर भारत आए थे। उस समय वे पहले बिलासपुर में आकर बसे थे, जहाँ करीब दो सौ परिवारों की बसाहट बनी। समय के साथ रोज़गार और बेहतर जीवन की तलाश उन्हें रायगढ़ ले आई।
शुरुआत में उनका कारोबार घोड़ों का था। पुराने समय में वे घोड़े खरीद-फरोख्त करते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, उन्होंने नया काम अपनाया और चश्मा बेचने का व्यवसाय शुरू कर दिया। लंबे समय तक यह समुदाय घूमंतु जीवन जीता रहा—गाँव-गाँव और शहर-शहर जाकर अपना सामान बेचता था। आखिरकार उन्होंने रायगढ़ के मिट्ठुमूड़ा इलाके में जमीन खरीदी और स्थायी रूप से बस गए। आज यह इलाका लगभग दो सौ परिवारों से आबाद “ईरानी मोहल्ला” के रूप में जाना जाता है।
इस समुदाय की एक खास पहचान यह भी है कि यहाँ केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएँ भी चश्मों के कारोबार में पारंगत हैं। ईरानी पुरुष आमतौर पर पावर वाले चश्मे बेचते हैं, जबकि महिलाएँ नजर के चश्मे और धूप के चश्मे बेचती दिखाई देती हैं। आय भले ही सीमित हो, लेकिन अपने परंपरागत काम से उनका जुड़ाव आज भी बना हुआ है। नए व्यवसाय अपनाने में रुचि कम है, पर अपने काम की समझ और अनुभव उन्हें अलग पहचान देता है।

मोहल्ले की महिलाओं की एक और दिलचस्प पहचान है—उन्हें पान का शौक काफी पसंद है। रोजमर्रा की बातचीत और काम के बीच पान उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। वैसे हजारो किलोमीटर दूर जा कर अपने लिए आशियाना तलाश लेना और वहां रच -बस जाना भी एक बड़ी बात है । लेकिन ऐसे ही नहीं कहा गया है कि हिन्दुस्तान सदा से दुनिया को आश्रय और ज्ञान देता रहा है. शायद यही हिन्दुतान की ताकत भी है।
फारसी बोलते लेकिन बच्चों को पढा रहे
समय के साथ इस समुदाय में बदलाव भी आया है। पहले शिक्षा पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था, लेकिन अब नई पीढ़ी को पढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। परिवार अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं ताकि वे बेहतर भविष्य बना सकें। भाषा और रिश्तों में भी उनकी परंपरा झलकती है। परिवारों के बीच आज भी फारसी बोली जाती है और अधिकतर रिश्ते अपने ही समुदाय के भीतर तय किए जाते हैं। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान पीढ़ी दर पीढ़ी बनी हुई है।

समुदाय के बुजुर्गों का कहना है कि उन्हें सरकार की योजनाओं और सहयोग से संतोष है। उनका मानना है कि छत्तीसगढ़ ने उन्हें बसने और जीवन आगे बढ़ाने का अच्छा अवसर दिया है।

रायगढ़ के इस ईरानी मोहल्ले की कहानी केवल एक बस्ती की कहानी नहीं, बल्कि यह बताती है कि लोग चाहे कहीं से आए हों, अगर उन्हें अपनापन और अवसर मिले तो वे अपनी पहचान बचाते हुए नए समाज का हिस्सा बन सकते हैं। यहाँ आज भी ईरान की झलक मिलती है—बोलचाल में, परंपराओं में और उस मेहनतकश जीवन में जो पीढ़ियों से चलता आ रहा है।(हरेराम तिवारी,वरिष्ठ पत्रकार)

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