रायगढ़िया होली के रंग और बहती फागुनी बयार की मस्ती,बुरा ना मानो होली है

रायगढ़ में बालसमुद्र के लहरों के ऊपर से गुजरकर गजमार पहाड़ी के ऊपर से जो सूरज निकल रहा है वो बता रहा है कि रायगढ़ में भी पूरे देश की तरह मस्ती भरी और महकी महकी फागुनी बयार बह रही गई है और जैसे जैसे दिन आगे बढ़ता जाएगा मेरी किरणे तेज होती जाएगी लेकिन सांझ ढलते ही मंद मंद शीतल बयार भी बहेगी जो आनन्दित कर देगी ।
रायगढ़ में बाग में बगीचों में सड़कों के किनारे आम् के पेड़ों पर बौर लदकर इठला रहें मानों कह रहे हैं कि इस जग में मेरी सुंदरता के मुकाबला कोई और नहीं कर सकता है ।पतझड़ में पुराने पत्तों को विदाई देने के बाद नीम ,पीपल ,बरगद में सुर्ख पल्लवों की कोपलें फूटने लगी हैं ,वो सूरज से कह रहीं हैं कि तुम्हारी प्रखर किरणों से लोगों को राहत और छाया देने के लिए हम तैयार हो रहें हैं ,।सेमर ,टेसू ,पलास ,भी अपने सुर्ख लाल ,सुनहले रंगों की अद्भुत छटा बिखेर रहें हैं तो महुये के फूल भी अपनी मदमस्त कर देने वाली सुंगध जंगल से लेकर खेतों और मैदानों में फैलानी के लिए तैयार हो चुके हैं तथा इस मौसम की सुंदरता में चार चांद लगा रहें हैं ।
अब बात करतें है खेतों की तो खेतों में धानी परिधान पहने हुए लहलहा रहे गेहूं अब रंग बदलना शुरू करके सुनहले होने लगे हैं आने वाले कुछ दिनों में खेतों पर दूर से सिर्फ सब तरफ सोने की चादर बिछी हुई हुई दिखाई देने लगेगी ।आप भी ध्यान से सुने बागों में छिपी कोयल के गीत भी सुनाई देंगे ।तो ऐसा रायगढ़ है मेरा।
वर्षों पहले रायगढ़ में रंग ,हुड़दंग ,भांग ,फाग ,नगाड़ों की थाप वाली वो होली जो होली से 15 दिन पहले शुरू हो जाती थी और होली के दिन अपने चरमोत्कर्ष तक पहुंच जाती थी वो होली अब यादों में सुनहरी याद बनकर रह गई है जिसके अब संस्मरण ही शेष रह गए हैं ।रंगों का यह त्योहार अब सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में ही मौजूद होते जा रहा है ।
रायगढ़ में वर्षों होली के आने का बेसब्री से इंतजार किया जाता था ।फागुन का महीना लगते ही लोगों के ऊपर फागुनी बयार का सुरूर छाना शुरू हो जाता था ।होली से 15 दिन पहले ही रंग खेलने का दौर शुरू हो जाता था ,।शहर के अंदर जो भी आता था वो बगैर रंग की छींट पड़े वापस नहीं जा पाता था ।जिनके कपड़े रंगने से बच जाया करते थे ऐसे लोग बिरले ही हुआ करते थे ।
फागुन का महीना लगते ही रायगढ़ के कई मोहल्लों में रात्रि में ढोलक , नगाड़े मंजीरों के साथ फाग गाने की परम्परा की शुरुआत हो जाया करती थी जो देर रात्रि तक चला करता था पर यह परम्परा भी लगभग दम तोड़ चुकी है ।
रायगढ़ में होलाष्टक के प्रथम दिवस जहां पर भी होलिका दहन किया जाता है वहां पर होलिका और भक्त प्रह्लाद का पूजन करने के बाद झंडा लगा हुआ बांस गाड़ दिए जाने की परंपरा है जिसका निर्वहन हर वर्ष होता जा रहा है ।
जिसके बाद मोहल्ले के लड़के होलिका में जलाए जाने के लिए लकड़ी का जुगाड़ करने की जुगत में लग जाया करते थे ।मोहल्लों के बीच यह अघोषित प्रतिस्पर्धा चला करती थी कि किस मोहल्ले की होलिका में सबसे ज़्यादा लकड़ी है और किसकी होली सबसे बड़ी बनी है ।बहुत से मोहल्लों में काफी देर रात्रि के बाद होलिका जलाई जाती थी।
होली के अवसर पर घर घर बनने वाले पकवानों में से खासकर गुझिया की वो महक अब भी मन में बसी हुई है ,खुरमी और दही बड़ा की तो बात ही निराला ,ठंडाई पीनेऔर भांग की कुल्फी खाने का मजा ही कुछ और था ।घर घर जाकर होली खेले जाने और मेल मुलाकात के साथ मन का मैल और आपसी खुन्नस ,मनमुटाव भी दूर कर लेने की परम्परा और संस्कृति दम तोड़ती जा रही है जिसकी रस्म अदायगी होली मिलन से की जा रही है
।
रायगढ़ में होली की बात करें तो रायगढ़िया होली पूरे अंचल में मशहूर रही है क्योंकि पुराने दौर में रायगढ़ में होली से एक पखवाड़ा पहले ही रंग खेलना शुरू कर दिया जाता फिर चाहे वो जूटमिल का क्षेत्र हो या फिर मध्य शहर का गाँधी गंज ,रामनिवास टाकीज चौक ,इतवारी बाजार ,शहीद चौक ,हटरी चौक ,सुभाष चौक ,केवड़ाबाड़ी चौक ,सतीगुड़ी चौक ,चक्रधरनगर चौक स्टेशन चौक का इलाका क्यों ना हो इन चौकों से रंग लगे बगैर बचना काफी मुश्किल था क्योंकि कहीं पीछे से पिचकारी ,फव्वारे की एक धार आती थी और कपड़ों को रंग से रंगीन कर जाती थी ,इसीलिए लोग होली से पहले ही पुराने कपड़े पहन कर घर से बाहर निकला करते थे ।
होलिका दहन और होली के दिन रंग खेलने की बात करें तो रायगढ़ शहर में उपर्युक्त स्थानों पर होली दहन का अद्भुत नजारा देखने को मिला करता था ।इसी तरह रंग खेलने, अपनों से मिलकर उन्हें रंग लगाने के लिए होलीबाजों की टोली निकल जाया करती थी साथ ढोल नगाड़े बजाने वाले तथा फाग गाने वाले लोग भी हुआ करते थे जोकि होली का रंग जमा दिया करते थे ।इनका जगह जगह ओर ठंडाई और गुझियों से स्वागत हुआ करता था ,रंग से भरी टँकी में डुबोकर रंग से तरबतर कर देने के दृश्य आम हुआ करते थे तो कहीं कहीं पर कपड़ा फाड़ होली भी हो जाया करती थी।
वर्तमान दौर की होली ने रायगढ़िया होली के स्वरूप को जीवंत बनाये रखा है भले ही उसका रूप होली मिलन के रूप में तब्दील हो गया हो नगर के कई स्थानों पर होली के मिलन के आयोजन किये जाते हैं जहां पर लोग जुट कर होली खेला करते हैं ,एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं ,भजिया, पकौड़ी ठंडाई और मिष्ठानों का लुत्फ उठाया करते हैं। पिछले कुछ वर्षों से रायगढ़ में शहीद चौक में सुशील मित्तल और उनके साथियों द्वारा आयोजित होने वाला होली मिलन रायगढ़ में अतीत की होली के रंग की याद दिलाता हुआ दिखाई देता है ।
और अंत में इतना ही कि होली के दिन अपने गिले -शिकवे भुलाकर आपस में मिलिए ,एक दूसरे को रंग और गुलाल लगाइए तथा एक नए दौर की शुरुआत कीजिये ,होली का यही तो सन्देश भी है ।
(अनिल पाण्डेय ,वरिष्ठ पत्रकार)



