सावन में रिमझिम बारिश के बीच सावन की बात बगैर झूला , कजरी और मेहंदी के अधूरी ही रहा करती है उसके बगैर सावन और बरसात की पूरी होने वाली नहीं है ।
पिया मेहंदी लिया द ,मोतीझील से
जाके साइकिल से ना
छोटी ननदी से पिसा द, हमरे हथवा लगा द, कांटा कील से,
जा के साइकिल से न!
आज के दौर में मेहंदी अब कुटी -पिसी हुई सूखी मेहंदी प्लास्टिक के पाउच में पैक की हुई मिल जाती है ,लेकिन वो भी ए@क जमाना था जब मेहंदी के पत्तों को उसकी झाड़ियों से चुनकर लाना पड़ता था ,सील पर लोढ़े से महीन पीसकर उसे हाथों पर सजाना पड़ता था ।इस तरह तैयार की हुई मेहंदी से उसका जो रंग उभरता था उसका मुकाबला बाजार में मिलने वाली आज की रेडीमेड मेहंदी नहीं कर सकती ।
सावन का महीना लगते ही घर ,आंगन और पेड़ों पर झूला पड़ जाया करते थे जहां पर झूला झूलते हुए महिलाओं और युवतियों के मुंह से श्रावणी ,पारम्परिक लोकगीतों की स्वर लहरियां सुनाई देती थी लेकिन अब वो बात बीते जमाने की याद बनकर रह गई है।(अनिल पाण्डेय)


