रायगढ़। कथक केवल नृत्य नहीं, बल्कि परंपरा, साधना, संस्कार और सृजन का ऐसा समन्वय है, जिसमें हर घराने की अपनी भाषा और हर गुरु की अपनी छाप होती है। रायगढ़ की धरती ने इस कला को केवल संरक्षण ही नहीं दिया, बल्कि राजा चक्रधर सिंह की दूरदृष्टि और साधना से कथक को एक विशिष्ट रचनात्मक पहचान भी प्रदान की। 41वें अंतरराष्ट्रीय चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या में बनारस से पहुंचे सुप्रसिद्ध कथक साधक
श्रीरुद्रशंकर मिश्रा ने इसी गौरवशाली परंपरा को अपनी दृष्टि से रेखांकित करते हुए कहा कि रायगढ़ के कलारसिकों और साधकों द्वारा चार दशकों से जिस सांस्कृतिक विरासत को सहेजा जा रहा है, वह स्वयं में गर्व का विषय है।
समारोह स्थल पर मीडिया से औपचारिक बातचीत में श्री मिश्रा ने कहा कि राजा चक्रधर सिंह का कथक के प्रति योगदान केवल संरक्षण तक सीमित नहीं था। उन्होंने कथक की रचनात्मक परंपरा को समृद्ध करने के साथ इसे नई दृष्टि और व्यापक आयाम दिया। उनके द्वारा रचित सैकड़ों छंद आज भी कथक साधकों के लिए अमूल्य धरोहर हैं।
चक्रधर के कथक में बनारस और लखनऊ दोनों की छाप
श्रीरुद्रशंकर मिश्रा ने कहा कि राजा चक्रधर सिंह के कथक में बनारस और लखनऊ दोनों की झलक मिलती है। कथक की परंपरा समय के साथ विभिन्न गुरुओं और घरानों से समृद्ध होती रही है। जयपुर की दृढ़ता, बनारस की वजनदारी और लखनऊ की नजाकत—इन सभी ने कथक की यात्रा को अलग-अलग रंग दिए हैं। उन्होंने कहा कि बनारस में कथक का अपना वजन है, जबकि लखनऊ की शैली अपनी नफासत और नजाकत के लिए पहचानी जाती है। अलग-अलग घरानों के गुरुओं से सीखने की परंपरा ने कलाकारों को एक ही शैली में सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उनकी साधना को व्यापक बनाया। यही भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
रायगढ़ घराना केवल इतिहास नहीं,आज भी जीवंत परंपरा
रायगढ़ घराने को लेकर श्रीरुद्रशंकर मिश्रा का नजरिया विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कहा कि रायगढ़ की प्रस्तुतियों और शैली को लेकर भले ही अलग-अलग वैचारिक मत हो सकते हैं, लेकिन कथक के क्षेत्र में रायगढ़ घराने की प्रासंगिकता से इनकार नहीं किया जा सकता।उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा में कलाकार अलग-अलग घरानों की विशेषताओं को सीखते और आत्मसात करते हैं। स्वयं उन्होंने भी विभिन्न शैलियों को समझने और सीखने की परंपरा को महत्व दिया। रायगढ़ की ‘इंद्रजाल’ जैसी प्रस्तुतियां इस घराने की रचनात्मक विशिष्टता को सामने लाती हैं। राजा चक्रधर सिंह के छंदों पर बनारस में भी प्रस्तुतियां हुई हैं, जो रायगढ़ की कला परंपरा के व्यापक प्रभाव को दर्शाती हैं।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि रायगढ़ घराना आज भी नृत्य के क्षेत्र में फल-फूल रहा है और इस विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता है।
राजा चक्रधर सिंह की रचनाधर्मिता का उल्लेख करते हुए श्रीरुद्रशंकर मिश्रा ने कहा कि उन्होंने चार सौ से अधिक छंदों की रचना की। पखावज की परंपरा से लेकर कथक की बारीकियों तक उनकी गहरी समझ थी। उन्होंने बड़े-बड़े गुरुओं से रचनाओं का नामकरण कराया और कथक की परंपरा को अपने समय की सीमाओं से आगे ले जाने का प्रयास किया। राजा चक्रधर की यही विशेषता उन्हें केवल एक राजा नहीं, बल्कि कला के गंभीर साधक और सृजनशील संरक्षक के रूप में स्थापित करती है। उनके नाम पर आयोजित यह समारोह आज भी देशभर के कलाकारों और कला साधकों को रायगढ़ की धरती पर खींच लाता है।
कबीर चौरा से कथक की साधना तक पहुंची रुद्रशंकर की यात्रा
अपने कथक से जुड़ाव के बारे में श्रीरुद्रशंकर मिश्रा ने बताया कि उनके जीवन में कथक का प्रवेश पारिवारिक संस्कारों के माध्यम से हुआ। उनके पिता माधव प्रसाद मिश्र और गुरु रविशंकर जी दोनों कथक से जुड़े रहे। बनारस के प्रसिद्ध कबीर चौरा क्षेत्र के निकट उनका घर रहा, जहां संगीत और कला के वातावरण ने उनकी साधना को दिशा दी।उल्लेखनीय है कि कथक की मंचीय साधना के साथ श्रीमिश्रा अकादमिक अध्ययन से भी जुड़े हैं। वे बीएचयू में पीएचडी कर रहे हैं और सीनियर रिसर्च फेलोशिप के माध्यम से कथक से संबंधित अध्ययन और शोध को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके व्यक्तित्व में मंचीय कलाकार, साधक और शोधार्थी—तीनों रूपों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
बनारस की सांगीतिक विरासत लेकर रायगढ़ पहुंची कला की त्रिवेणी
कथक कलाकार श्रीरुद्रशंकर मिश्रा के साथ उदयशंकर मिश्रा, संतूर वादक दिव्यांश तथा पखावज पर सलमान भी रायगढ़ पहुंचे। बनारस की सांगीतिक परंपरा से जुड़े इन कलाकारों की संगत ने चक्रधर समारोह के मंच को देश की विविध शास्त्रीय परंपराओं के मिलन का साक्षी बनाया।चक्रधर समारोह की आठवीं संध्या का महत्व इसलिए भी विशेष रहा कि यहां बनारस की साधना और रायगढ़ की सृजनधर्मिता आमने-सामने नहीं, बल्कि एक-दूसरे से संवाद करती दिखाई दी। यही संवाद उस विरासत की वास्तविक शक्ति है, जिसे राजा चक्रधर सिंह ने अपने समय में सींचा और जिसे आज कलाकारों की पीढ़ियां आगे बढ़ा रही हैं।
‘चक्रधर’ नाम आज भी कलाकारों को रायगढ़ खींच लाता है
चार दशक से अधिक समय से आयोजित यह समारोह आज राजा चक्रधर सिंह की स्मृति से कहीं आगे बढ़कर भारतीय शास्त्रीय कला की एक महत्वपूर्ण पहचान बन चुका है। देश के अलग-अलग हिस्सों से कलाकार यहां आते हैं, अपनी साधना प्रस्तुत करते हैं और रायगढ़ की उस मिट्टी को नमन करते हैं, जिसने कथक को एक विशिष्ट घराना दिया।
सांस्कृतिक समारोह की आठवीं संध्या में रुद्रशंकर मिश्रा की उपस्थिति इसी निरंतर यात्रा की एक खूबसूरत कड़ी बनी—जहां बनारस की परंपरा ने रायगढ़ की चक्रधर विरासत के सामने अपनी कला अर्पित की और दोनों सांस्कृतिक धाराएं एक ही मंच पर एकाकार होती नजर आईं।
(हरेराम तिवारी,वरिष्ठ पत्रकार)


