व्यक्तिगत विचारधारा अपनी होती है ,विचारधारा का निर्माण स्कूल के जमाने से होने लगता है जो समय बीतने के साथ सुदृढ़ ,परिपक्व ,मजबूत और निखरती है । लेकिन इसके बावजूद व्यक्तिगत विचारधारा का उसकी पत्रकारिता ,समाचारों ,लेखों से कोई लेना देना देना नही होना चाहिए । पत्रकारीय धर्म अलग है और व्यक्तिगत विचारधारा अलग होती है । विचारधारा के विपरीत जाकर अपना पत्रकारीय धर्म निभाना बहुत मुश्किल और कठिन डगर होती है ,इस पथ पर चलना सच्ची पत्रकारिता होती है ।कभी कभी पत्रकार भावनाओं में बह जाता है ,लिखते समय भावनाओं पर काबू भी पाना पड़ता है ।हमें यह भी सिखाया गया था कि सत्ता पक्ष की आलोचना करना ,उसकी नीतियों और योजनाओं की खामियों को उजागर करते हो तो सत्ता पक्ष के अच्छे कार्यों को भी सामने लाना चाहिए सिर्फ आलोचना ही मकसद नही होना चाहिए क्योंकि ऐसा किया जाएगा या फिर सिर्फ सत्ता पक्ष की प्रशंसा ही कि जाएगी तो वह एजेंडा ,चाटुकारिता की श्रेणी में आएगा ।
पत्रकारिता रीढ़विहीन नहीं होनी चाहिए । राजनीति में रीढ़विहीन ,अवसरवादी नेताओं की कोई विचारधारा नही होती है ।इनका सिर्फ एक मकसद होता है कि किस तरह सत्ता की कुर्सी से चिपका जाए या फिर सत्ता के प्रभा मंडल के चारों तरफ घूमते रहा जाए ।
अपने अंदर छिपे रावण को जलाएं दुनिया खूबसूरत लगेगी
रावण इस साल भी जलेगा ,देखकर हम खुश भी होंगे ,बुराई पर अच्छाई की ,असत्य पर सत्य की जीत बताएंगे ,लेकिन यह सब बात तब तक बेमानी है जब तक हम अपने मन के अंदर छिपे रावण का दहन नहीं करेंगे ।जब हम अपने मन के अंदर का रावण दहन करेंगे तब हमें यह दुनिया बेहद खूबसूरत लगने लगेगी । दुनिया को खूबसूरत बनाने के लिए हम भी अपना योगदान दें और अपने अंदर छिपे अहंकार ,घमंड ,अभिमान ,छल और अन्य बुराइयों को दूर कर के ही हम अपने अंदर छिपे रावण को समाप्त कर पाएंगे ।