यूपी में आराधना मिश्रा को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने पुरानी जड़ों की तरफ वापसी का दिया संकेत ?

(अनिल पाण्डेय)
उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने दलित राजेन्द्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी ,ब्राह्मण चेहरा श्री मती आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष और मुस्लिम इमरान मसूद को प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर अपनी पुरानी जड़ों में वापस लौटने का संकेत दिया है । यूपी में कांग्रेस के अतीत में जाएंगे तो यह देखेंगे कि 1985 तक ब्राह्मण ,मुस्लिम और दलित का गठजोड़ ही कांग्रेस की ताकत रहे हैं लेकिन जबसे इन्होंने कांग्रेस से रूठकर अपना रास्ता बदला तब से कांग्रेस कमजोर होते चले गई जिसका नतीजा निकला कि यूपी में कांग्रेस के पास जमीनी संगठन ही मौजूद नही है।
पार्टी पदाधिकारियों को लेकर यूपी में कांग्रेस ने जो सोशल इंजीनियरिंग की है उसे जमीन पर उतारना इन पदाधिकारियों के लिए एक ऐसी चुनोती है जो कि टेढ़ी खीर से कम नहीं है । कागज पर बनाई प्लानिग को जमीन पर उतारने के लिए ,यूपी में लुप्तप्राय कांग्रेस को वजूद में लाने के लिए जमकर पसीना बहाना होगा ,हाड़तोड़ मेहनत करनी होगी लेकिन सबसे बडा सवाल तो यही है कि लोगों का जो भरोसा कांग्रेस के ऊपर से उठ चुका है उसे वापस कैसे लाये ?
कांग्रेस ने यूपी में भले ही ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए श्री मती आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया हो लेकिन यह जाहिर सी बात है कि पर्दे के पीछे का सारा खेल कांग्रेस के पुराने चावल उनके पिता प्रमोद तिवारी ही खेलेंगे । प्रमोद तिवारी जो कि वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं उन्होंने रामपुर खास सीट से लगातार 9 बार विधानसभा का चुनाव जीत कर एक रिकॉर्ड भी स्थापित किया है ।उनके प्रदेश में कांग्रेस के पुराने नेताओं से सम्बन्ध और सम्पर्क हैं जिनमे से ऐसे लोग भी शामिल हैं जो घर बैठे हुए हैं । देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रमोद तिवारी ऐसे लोगों को सक्रिय कर पाएंगे ?सवाल यह भी बनता है कि यूपी में कांग्रेस द्वारा ब्राह्मण चेहरा दिए जाने मात्र से ही कांग्रेस से वर्षों पहले मुख मोड़ चुका ब्राह्मण क्या कांग्रेस की तरफ वापसी का रुख करेगा ? फिलहाल तो इसके आसार कम ही दिखाई देते हैं लेकिन कुछ ना कुछ तो रस्साकसी जरूर होगी इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है ।
सवालों के सही उत्तर समय के गर्भ में ही छिपा हुआ है जो सही समय आने पर ही सामने आएगा ।
यूपी में कांग्रेस संगठन में फेरबदल करके जो राजनैतिक चालें चल रही है वो दरअसल में 2029 में होनेवाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखती हुई चली जा रहीं हैं लेकिन उसकी गूंज 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जरूर सुनाई देगी ।